धर्मेंद्र के बचपन से आखिरी अलविदा तक – माँ, पिता, भाई-बहन और ही-मैन की पूरी इमोशनल कहानी

 

धर्मेंद्र के बचपन से आखिरी अलविदा तक – माँ, पिता, भाई-बहन और ही-मैन की पूरी इमोशनल कहानी

मुंबई / सहनेवाल, 25 नवंबर 2025
धर्मेंद्र का बचपन और सहनेवाल का मिट्टी का घर – ‘पाजी आपका कोट है’ की कहानी

बॉलीवुड के ही-मैन, धर्मेंद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे।
24 नवंबर 2025 की सुबह, मुंबई में 89 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी साँस ली।
सिनेमा की दुनिया, सोशल मीडिया और फैंस – सब जगह सिर्फ़ एक ही नाम गूँज रहा है:
धर्मेंद्र… ही-मैन… गरम धर्म…

लेकिन इस शोर के बीच एक पुराना सा वाक्य फिर से ज़िंदा हो गया है –
“पाजी आपका कोट है!”
ये सिर्फ़ एक लाइन नहीं, ये उस बच्चे की पूरी कहानी है जो मिट्टी के घर से निकलकर बॉलीवुड का लीजेंड बना, जिसके पास करोड़ों थे, लेकिन जिसके दिल में आज भी माँ की ममता, पिता की लाठी और भाई-बहनों की राखी बसती थी।

सहनेवाल का मिट्टी का घर और “पाजी आपका कोट है” की शुरुआत

साल 1935, पंजाब के लुधियाना ज़िले का सहनेवाल गाँव। मिट्टी का छोटा सा घर, फूस की छत, बाहर खेत, अंदर माँ की गोद। यहीं जन्म हुआ धर्म सिंह देओल का – जिसे दुनिया ने आगे चलकर धर्मेंद्र, और फिर ही-मैन ऑफ बॉलीवुड के नाम से जाना।

सर्दियों में उनके पास एक ही अच्छा कोट होता था। वो कोट, जो उनके पिता केवल किशन सिंह देओल ने बड़ी मेहनत से खरीदा था। धर्मेंद्र उसे बहुत संभालकर रखते – स्कूल जाएँ, गाँव में घूमें – वही कोट, वही शान।

एक दिन अचानक कोट गायब हो गया। उन्होंने माँ सतवंत कौर से पूछा –
“माँ, मेरा कोट कहाँ है?”
माँ ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –
“पाजी आपका कोट है… किसी ठंडे को दे दिया।”

ये सुनते ही धर्मेंद्र की आँखें भर आईं। उन्होंने माँ को गले लगाकर कहा –

“आज से मेरे सारे कोट तुम्हारे हैं माँ… जितने चाहे, उतने बाँट देना।”

आज जब लोग कहते हैं कि धर्मेंद्र के पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति थी, तो सच में लगता है कि उनकी सबसे बड़ी दौलत वो नहीं थी, उनकी सबसे बड़ी दौलत उनकी माँ का दिल था, जो किसी को ठंड में काँपता नहीं देख सकता था।

माँ सतवंत कौर के 7 किस्से, जो ही-मैन को ही-मैन बनाते हैं

धर्मेंद्र ने कई इंटरव्यू में अपनी माँ के बारे में भावुक होकर किस्से सुनाए। कपिल शर्मा शो हो, पुराने टीवी इंटरव्यू हों या मैगज़ीन की बातें – हर जगह एक ही बात सामने आती है: ही-मैन की असली ताकत उनकी माँ थी।

  • 1. “मेरे पास सिर्फ़ दो कुर्ते थे…”
    उन्होंने कहा था – “जब मैं बॉम्बे आया, मेरे पास सिर्फ़ दो कुर्ते थे। बाकी सब कपड़े माँ गरीबों में बाँट चुकी थीं।”
  • 2. पहली फिल्म नहीं, पहली रोटी की चिंता
    जब गाँव में फिल्म लगी और धर्मेंद्र देखने जाना चाहते थे, माँ ने गेट पर रोक लिया – “पाजी, घर में रोटी नहीं है, और तू फिल्म देखेगा?” उस रात माँ ने आधी रोटी खुद खाई, आधी बेटे को दी। उसी दिन धर्मेंद्र ने ठान लिया – एक दिन माँ को सिनेमा हॉल में खुद बिठाऊँगा।
  • 3. रेडियो, बिनाका गीतमाला और माँ की जागी रातें
    गाँव में पहला रेडियो आया। धर्मेंद्र रात को चुपके से बिनाका गीतमाला सुनते। माँ ने पहले तो डाँटा, फिर खुद चादर ओढ़कर बेटे के साथ बैठने लगीं। उन्हें लता मंगेशकर की आवाज़ बहुत पसंद थी।
  • 4. “तू हीरो बनेगा” – माँ की भविष्यवाणी
    14 साल के धर्मू ने राज कपूर की फोटो देखकर कहा – “माँ, मैं भी हीरो बनूँगा।” माँ ने हँसकर कहा – “तू तो मुझसे भी सुंदर है, तू ज़रूर हीरो बनेगा।” यहीं से उनके भीतर का हीरो ज़िंदा हो गया।
  • 5. पहली कमाई – 11 रुपये और 1 रुपये की मिठाई
    गाँव में ट्रैक्टर चलाकर उन्होंने 11 रुपये कमाए। सारे पैसे माँ को दे दिए। माँ ने 10 रुपये मंदिर में चढ़ाए, और 1 रुपये से बेटे के लिए मिठाई लाई। धर्मेंद्र हमेशा कहते थे – “मैंने आज तक वो 1 रुपये वाली मिठाई का स्वाद नहीं भुलाया।”
  • 6. माँ का आखिरी बुलावा – “पाजी… अब घर आ जा”
    2020 में माँ अस्पताल में थीं। वीडियो कॉल पर उन्होंने आखिरी बार कहा – “पाजी… अब तू घर आ जा…” उस दिन के बाद से धर्मेंद्र जब भी सहनेवाल याद करते, रो पड़ते थे।
  • 7. आज भी गूंजता है – “पाजी आपका कोट है”
    आज जब वो नहीं हैं, तो हर गरीब की मदद करने वाला ये एक वाक्य पूरे देश के दिल में गूँज रहा है – जितना मिले, थोड़ा किसी और को भी दे दो।

पिता की सख्ती, लाठी और “सीना तान के चलो” की सीख

जहाँ माँ ममता थीं, वहीं पिता केवल किशन सिंह देओल अनुशासन थे। वो गाँव के स्कूल मास्टर थे – लंबे कद, सख्त स्वभाव, हाथ में हमेशा लाठी। गाँव भर में मशहूर थी मास्टर जी की लाठी।

एक बार स्कूल में लड़ाई हो गई। पिता को पता चला तो वो लाठी लेकर पीछे पड़ गए। धर्मेंद्र खेतों में भागे, पेड़ पर चढ़ गए। पिता नीचे से बोले –

“उतर जा, नहीं तो पेड़ काट दूँगा!”

उस दिन लाठी नहीं पड़ी, लेकिन उन्होंने बेटे को ये एहसास ज़रूर दिलाया कि गलती पर समझाने के साथ-साथ डर भी ज़रूरी है।

पिता घर में सिर्फ़ पंजाबी बोलने देते थे। एक दिन धर्मेंद्र ने अंग्रेज़ी में “Good Morning” बोल दिया। तुरंत कान पकड़कर खड़ा कर दिया और कहा –

“सुबह सत श्री अकाल बोल, नहीं तो स्कूल भी मत जा।”

इसी सख्ती की वजह से आगे चलकर उनके अंदर एक अलग किस्म का रूटीन और मेहनत आया, जो उन्हें बाकी हीरो से अलग बनाता है।

बॉम्बे जाने से रोकना और फिर गर्व से सर उठाना

जब उन्हें Filmfare Talent Hunt से बॉम्बे आने का मौका मिला, पिता ने पहला लेटर ही फाड़ दिया –

“नाच-गाना करने वाला बनेगा? मास्टर बन, आदमी बन।”

लेकिन सपने बड़े थे, धर्मेंद्र चुपके से मुंबई पहुँच गए। पहली फिल्म साइन होने के बाद उन्होंने पिता को लिखा – “पापा, आपकी लाठी से बचकर आया हूँ, अब नाम रोशन करूँगा।”

जब उनका नाम पूरे देश में गूँजने लगा, तो वही पिता गर्व से कहते थे –

“अब मेरी लाठी की नहीं, मेरे बेटे के नाम की गूँज लोगों को सीधा रखती है।”

भाई-बहन, राखी, 1 रुपये का वादा और सहनेवाल का आँगन

धर्मेंद्र के घर में कुल 6 भाई-बहन थे। एक ही खाट, एक ही आँगन, एक ही छत – और ढेर सारी हँसी–मज़ाक और लड़ाई–झगड़े।

छोटा भाई अजीत – “भाईया, अब मत जाना”

छोटे भाई अजीत सिंह देओल उनसे काफ़ी छोटे थे। जब भी धर्मेंद्र बॉम्बे से गाँव आते, अजीत उनके पैरों से लिपट जाते और रोते हुए कहते –

“भाईया, अब मत जाना…”

धर्मेंद्र उन्हें कंधे पर बैठाकर पूरा गाँव घुमाते। सालों बाद जब अजीत की मौत हुई, तो आखिरी पल तक उनके मुँह पर यही नाम था – “धर्म… धर्म…” धर्मेंद्र ने उनके माथे पर माथा रखकर कहा –

“तू गया तो मेरा बचपन भी चला गया…”

बहनें, राखी और 1 रुपये का रिश्ता

तीन बहनें थीं। हर रक्षा बंधन पर तीनों बहनें एक साथ राखी बाँधतीं। ज्यादा पैसे नहीं होते थे, हर बहन को 1–1 रुपया देते और हँसकर कहते –

“एक दिन ही-मैन बनूँगा, तब सोने की राखी बँधवाऊँगा।”

आज भी कहा जाता है कि बड़ी बहन के पास वो 1 रुपये का पुराना सिक्का अब तक संभालकर रखा है। 2024 में एक बहन के नहीं रहने पर जब उनको एक राखी कम दिखी, तो वो टूटकर रो पड़े थे। उन्होंने खुद तीनों राखियाँ अपने ही हाथ पर बाँध लीं और कहा –

“अब मैं खुद ही अपनी बहन बन जाऊँगा…”

सहनेवाल का मिट्टी का घर – जो आज पहली बार रोया

सहनेवाल का वो पुराना मिट्टी का घर आज भी मौजूद है। दीवारें झुकी हुईं, दरवाज़ा टूटा हुआ, लेकिन आँगन में अभी भी जैसे बचपन की हँसी और चीखें गूँजती हैं।

उसी घर में वो खाट पड़ी है, जिस पर छह भाई-बहन एक साथ सोया करते थे। उसी खाट पर रखा वो पुराना तकिया, जिस पर 2023 में धर्मेंद्र ने आखिरी बार सिर रखा और धीरे से कहा –

“माँ नहीं है… अब ये तकिया भी ठंडा लगता है…”

आज जब उनकी अर्थी उठी, तो लगा जैसे ये घर भी पहली बार रो पड़ा हो।

आखिरी कॉल, आखिरी साँस और “पाजी… अब तू घर आ जा”

खबरों के मुताबिक, 24 नवंबर 2025 की सुबह करीब 6:15 बजे धर्मेंद्र ने अपने बेटे संनी देओल को आखिरी फोन किया। आवाज़ धीमी थी, साँस भारी। उन्होंने बस इतना कहा –

“संनी… मैं थक गया हूँ… माँ बुला रही है, पापा बुला रहे हैं, अजीत बुला रहा है… मैं जा रहा हूँ बेटा… तुम सब को गले लगा देना…”

7:42 बजे के आस-पास ही-मैन की साँस हमेशा के लिए रुक गई। घर के अंदर हेमा मालिनी की सिसकियाँ, बाहर संनी और बॉबी की भीगी आँखें, गेट के बाहर फैंस का हुजूम – लेकिन ऊपर कहीं, शायद माँ सतवंत कौर मुस्कुरा रही हों और कह रही हों –

“पाजी… अब सच में घर आ जा…”

“पाजी आपका कोट है” – सिर्फ़ किस्सा नहीं, ज़िंदगी जीने का फ़ॉर्मूला

धर्मेंद्र की पूरी ज़िंदगी अगर एक लाइन में समझनी हो, तो वो यही है –

“जितना भी मिले, थोड़ा सा किसी और को भी दे दो।”

उनकी माँ ने कपड़ों के ज़रिए ये बात सिखाई, उनके पिता ने लाठी के ज़रिए हिम्मत सिखाई, भाई-बहनों ने उन्हें ज़िम्मेदारी सिखाई, और सहनेवाल के मिट्टी के घर ने उन्हें ज़मीन से जोड़े रखा।

आज जब हम उन्हें ही-मैन, लीजेंड, सुपरस्टार कहकर विदा कर रहे हैं, तो ये कहानी हमें याद दिलाती है कि ऊपर जाते वक्त न नाम साथ जाता है, न शोहरत, न पैसा – सिर्फ़ माँ की दुआ, और किसी ठिठुरते इंसान के लिए दिया हुआ “पाजी आपका कोट…” साथ जाता है।

धर्मेंद्र साहब, आप जहाँ भी हैं… आपकी माँ, आपके पापा, आपके भाई-बहन – सब आपका इंतज़ार कर रहे होंगे। और हम यहाँ से बस इतना ही कह सकते हैं –

“पाजी… अब सच में घर आ जा…”

ॐ शांति ॐ

Author: The Digital News Hub

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